सौदा

एक आदमी ने दुकानदार से पूछा – केले और सेवफल क्या भाव लगाऐ हैं ? केले 20 रु.दर्जन और सेव 100 रु. किलो । उसी समय एक गरीब सी औरत दुकान में आयी और बोली मुझे एक किलो सेव और एक दर्जन केले चाहिये – क्या भाव है भैया ? दुकानदार: केले 5 रु दर्जन और सेब 25 रु किलो। औरत ने कहा जल्दी से दे दीजिये । दुकान में पहले से मौजूद ग्राहक ने खा जाने वाली निगाहों से घूरकर दुकानदार को देखा । इससे पहले कि वो कुछ कहता – दुकानदार ने ग्राहक को इशारा करते हुये थोड़ा सा इंतजार करने को कहा।

औरत खुशी खुशी खरीदारी करके दुकान से निकलते हुये बड़बड़ाई – हे भगवान तेरा लाख- लाख शुक्र है , मेरे बच्चे फलों को खाकर बहुत खुश होंगे । औरत के जाने के बाद दुकानदार ने पहले से मौजूद ग्राहक की तरफ देखते हुये कहा : ईश्वर गवाह है भाई साहब ! मैंने आपको कोई धोखा देने की कोशिश नहीं की यह विधवा महिला है जो चार अनाथ बच्चों की मां है । किसी से भी किसी तरह की मदद लेने को तैयार नहीं है। मैंने कई बार कोशिश की है और हर बार नाकामी मिली है।तब मुझे यही तरीकीब सूझी है कि जब कभी ये आए तो मै उसे कम से कम दाम लगाकर चीज़े दे दूँ। मैं यह चाहता हूँ कि उसका भरम बना रहे और उसे लगे कि वह किसी की मोहताज नहीं है। मैं इस तरह भगवान के बन्दों की पूजा कर लेता हूँ ।

थोड़ा रूक कर दुकानदार बोला : यह औरत हफ्ते में एक बार आती है। भगवान गवाह है जिस दिन यह आ जाती है उस दिन मेरी बिक्री बढ़ जाती है और उस दिन परमात्मा मुझपर मेहरबान होजाता है । ग्राहक की आंखों में आंसू आ गए, उसने आगे बढकर दुकानदार को गले लगा लिया और बिना किसी शिकायत के अपना सौदा खरीदकर खुशी खुशी चला गया ।

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श्री रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के  उल्लेख 

आम तौर पर हिंदुस्तान में ऐसे परिस्थितियां कई बार उत्पन्न हुई जब राम -मंदिर और बाबरी मस्जिद (ढांचा ) एक विचार-विमर्श का मुद्दा बना और कई विद्वानों ने चाहे वो इस पक्ष के हो या उस पक्ष के अपने विचार रखे . कई बार तुलसीदास रचित रामचरित मानस पर भी सवाल खड़े किये गए की अगर बाबर ने राम -मंदिर का विध्वंश किया तो तुलसीदास जी ने इस घटना का जिक्र क्यों नही किया . 
सच ये है कि कई लोग तुलसीदास जी कि रचनाओं से अनभिज्ञ है और अज्ञानतावश ऐसी बातें करते हैं . वस्तुतः रामचरित्रमानस के अलावा तुलसीदास जी ने कई अन्य ग्रंथो की भी रचना की है . तुलसीदास जी ने तुलसी शतक में इस घंटना का विस्तार से विवरण भी दिया है .

हमारे वामपंथी विचारको तथा इतिहासकारो ने ये भ्रम की स्थति उतप्पन की , कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नही है . श्री नित्यानंद मिश्रा ने जिज्ञाशु के एक पत्र व्यवहार में “तुलसी दोहा शतक ” का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है | हमनें भी उस अर्थो को आप तक पहुंचने का प्रयास किया है | प्रत्येक दोहे का अर्थ उनके नीचे दिया गया है , ध्यान से पढ़ें |

*(1) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।*

    *जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

*(2) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।*

     *भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

*(3) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।*

    *हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

*(4) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।*

      *तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥*

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)
श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।
*(5) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।*

      *जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥*

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

*(6) दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।*

      *तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥*

मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

*(7) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।*

     *तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खल नीच ॥*

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

*(8)रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।*

    *तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥*

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।
अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है 

 बक्सर

कभी बक्सर का इलाका जंगल हुआ करता था । जंगल के बीचोबीच एक सर (तालाब ) था , जहां बाघ पानी पीने आया करते थे । बाघ को संस्कृत में व्याघ्र कहते हैं । इसलिए इस जगह को व्याघ्रसर कहा जाने लगा । यही व्याघ्रसर कालांतर में अपभ्रंशित हो बघसर या बगसर हो गया । आज इस जगह को हम बक्सर के नाम से जानते हैं । पौराणिक काल में यह जगह विश्वामित्र की तपस्थली थी । वही विश्वामित्र जिन्होंने गायत्री मंत्र का आविष्कार किया था । ताड़का , सुबाहु और मारीच जैसी आसुरी शक्तियां विश्वामित्र के तप को भंग करती रहतीं थीं । राम ने इनका नाश कर विश्वामित्र और उनके समकालीन ऋषियों का तप भंग होने से बचा लिया था । 
विश्वामित्र को इसी जगह पर सिद्धि मिली थी । विश्वमित्र , लोपमुद्रा व अन्य ऋषियों ने यहीं पर ऋग्वेद की रचना की थी । इसलिए यह जगह सिद्धाश्रम या वेदगर्भापुरी के नाम से भी जाना गया । बक्सर भगवान के वामन अवतार के लिए भी जाना जाता है । आज बक्सर पंच कुण्ड , पंचाश्रम व पंच शिवलिंग के कारण एक तीर्थ स्थल बन गया है । माघ की पंचमी से बक्सर में पंचकोसी मेला लगता है , जो गौतम आश्रम (अहिरौली ) से शुरू होकर नारद आश्रम ( नदांव ) , भार्गवाश्रम (भभुवर ) , उत्ताकाश्रम ( उनांव ) होते हुए विश्वामित्राश्रम ( चरितर वन ) में खत्म होता है , जहां लिट्टी चोखा का भोग लगता है , जिसे उस दिन प्रसाद के रूप में खाया जाता है ।
बक्सर के पास 1539 ई में हुमायूं और शेरशाह सूरी के बीच लड़ाई लड़ी गयी थी । इस युद्ध का परिणाम शेरशाह सूरी की तरफ रहा था । हूमायूं अपनी जान बचाने के लिए उफनती हुई गंगा नदी पार कर गया । इस काम में एक भिश्ती ने उसकी मदद की थी । भिश्ती का नाम निजाम था । जब हूमायूं बादशाह बना तो उसने उस भिश्ती को ढाई दिन के लिए बादशाह बना दिया एहसान चुकता करने के लिए । भिश्ती ने बादशाहत मिलते हीं टकसाल की तरफ रूख किया । उसने चमड़े के सिक्के टकसाल में बनवाने का आदेश दिया । टकसाल में धड़ल्ले से चमड़े के सिक्के बनने शुरू हो गये । ढाई दिन में अच्छा खासा चमड़े के सिक्कों का कलेक्शन हो गया । भिश्ती ने नियत समय के बाद बादशाह की पोशाक उतार भिश्ती की पोशाक पहन ली थी । ढाई दिन के इस बादशाह की इस सोच के पीछे मंशा क्या थी ? पता नहीं चल पाया। शायद , उसने सोचा होगा कि लीक से हटकर काम करने से लोग उसे हमेशा याद रखेंगे ।
बक्सर में एक और लड़ाई लड़ी गयी थी 1764 के दौर में । एक तरफ मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय , शुजाउद्दौला व मीर कासिम की संयुक्त सेना थी तो दूसरी तरफ अंग्रेज मेजर मुनरो की सेना । मेजर मुनरो की सेना में 857 सैनिक और 28 बदूकधारी थे तो दूसरी तरफ की संयुक्त सेना में हजारों की तादाद में सैनिक थे । इन हजारों सैनिकों की स्वामि भक्ति अपने अपने स्वामियों के प्रति हीं थी और वे परस्पर अविश्वास व संदेह का भाव रखते थे । इसलिए तादाद अच्छी होने के बावजूद यह सेना संगठित नहीं थी । वहीं अंग्रेजी सेना संगठित व चाक चौबंद थी । अंग्रेजी सेना का सबसे सबल पक्ष उसका बंदूक से लैस होना था । बंदूकधारियों ने युद्ध में निर्णायक भूमिका निभायी । दो हजार से ऊपर सैनिक संयुक्त सेना के मारे गये ।

गंगा लाशों से पट गयी । गंगा माई ने स्वंय उन सैनिकों का दाह कर्म कर दिया था । कुछ सैनिकों की लाशें गंगा के किनारे पायीं गयीं । इन सैनिकों को हथियार समेत एक कुएं में दफना दिया गया । इस युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूरे भारत पर अधिकार हो गया । अंग्रेजों ने बक्सर की लड़ाई के बाद यहां एक विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया , जिस पर अंग्रेजी , हिंदी , उर्दू व बंगला में उनकी विजय गाथा लिखी हुई थी । सन् ’42 में देश भक्तों ने इस विजय स्तम्भ को तोड़ दिया था ।

बक्सर का कारागार एक ऐसा एकलौता कारागार है , जहां फांसी का फंदा तैयार होता है । 1844 में अंग्रेजों ने फांसी का फंदा बनवाना शुरू किया था । 1884 में पहली बार एक भारतीय कैदी को इस तरह के फांसी के फंदे पर लटकाया गया । एक फांसी के फंदे की कीमत 182 /- होती है । इसकी रस्सी को मनीला रस्सी कहा जाता है , जो 187 किलो वजन को सम्भाल सकती है । बक्सर कारागार के अलावा यह रस्सी पूरे भारत में प्रतिबंधित है ।

बक्सर कारागार में देशभक्त महेन्दर मिसिर भी कैद किए गये थे । वे पूरबी गीतों के बेताज बादशाह थे । कारागार कोठरी में जब वे पूरबिया तान लेते थे तो अंग्रेज जेलर की पत्नी उनकी कोठरी तक भाग कर आ जाती थीं । वे उनकी पूरबिया गीतों की मुरीद थीं । महेन्दर मिसिर ने जेल में रहते हुए पूरी रामायण भोजपुरी में लिख दी थी । कई और किताबें लिखीं , पर वे पूरबी गीतों की वजह से हीं ज्यादा प्रसिद्ध रहे। कारागार में उनके अच्छे आचरण के कारण जेल अधीक्षक ने उन्हें सजा पूरी होने से पहले हीं छोड़ देने की अनुशंसा की । महेन्दर मिसिर को सजा पूरी होने से पहले हीं छोड़ दिया गया ।
बक्सर में आजादी का जश्न 15 व 16 अगस्त दो दिनों के लिए मनाया जाता है । 15 अगस्त 1947  को देश आजाद हुआ था । 16 अगस्त 1942 को बक्सर के डुमरांव थाने पर देशभक्तों की मौत हुई थी । डुमरांव थाने के दरोगा देवनाथ सिंह ने निहत्थे देशभक्तों पर गोली चलायी थी , जिसमें कपिल मुनि , रामदास सुनार , रामदास लोहार और गोपाल जी की मौत जगह पर हीं हो गयी थी । एक साथ इतनी मौत होने के बाद भीड़ बेकाबू हो गयी । दरोगा देवनाथ सिंह को भागकर अपनी जान बचानी पड़ी। भीड़ ने डुमरांव थाना फूंक दिया था । 16 अगस्त को इन शहीदों को याद किया जाता है । उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है ।
बक्सर में एक गांव है भेलूपुर । यहीं की मिट्टी से जुड़े थे कैरेबियन द्वीप समूह के प्रधान मंत्री कमला प्रसाद बिसेसर । कमला प्रसाद विसेसर के पूर्वज रामलखन मिश्र 22 साल की उम्र में गिरमिटिया मजदूर बन भेलूपुर से त्रिनिदाद गये थे । श्री विसेसर के रिश्तेदारों को खोजने का जिम्मा पेशे से जियोलाॅजिस्ट प्रोफेशर रहे प्रसिद्ध इतिहासज्ञ शम्सुद्दीन को दिया गया था । शम्सुद्दीन के प्राणप्रण कोशिश का नतीजा निकला । कमला प्रसाद विसेसर अपने पूर्वजों की धरती भेलूपुर पहुंचने में कामयाब हो गये । कैरेबियन प्रधान मंत्री भेलूपुर पहुंचकर भावुक हो गये ।उनकी आंखों से आंसू निकल आये । अपनी जड़ों से जुड़ने की अकुलाहट हीं उन्हें बक्सर के भेलूपुर गांव खींच लायी थी

जय बक्सर 

​भारतीय प्राच्यविद्या

भारतीय प्राच्यविद्या को अंधविश्वासों से जोड़ दिया गया, जबकि उसमें गणित, व्याकरण, काव्य, चिकित्सा की अद्भुत दृष्ट‍ियां हैं. आज कोई  हिंदुस्तान की किसी बड़ी अकादमी से पढ़कर निकले और राजशेखर, भरतमुनि, व्यास, पाणिनि, आर्यभट या कुमारिल को उद्धृत करे! इस पूरी ज्ञान-परंपरा को ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहकर निरस्त करने की कोशिशें आज भी की जा रही हैं!

संस्कृत का नाम लो तो पढ़े लिखे बुद्धिजीवी नाक-भौं सिकोड़ते हैं और “अष्टाध्यायी” और “अमरकोश” की बात करो तो सामान्यजन यूं कौतुक से देखते हैं, जैसे किन्हीं विलायती ग्रंथों का नाम ले लिया हो! यह भारत है, जहां अच्छी अंग्रेज़ी लिखना गर्व की बात मानी जाती है और अच्छी हिंदी हमें असहज कर देती है. सुशोभित को तो उसकी क्लिष्ट तत्समनिष्ठ हिंदी के लिए तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों द्वारा ही नियमित टोका जाता है तो किसी और की बात क्या करें! योग तक को “भगवा” माना जाता है! 
हमारे बुद्धिजीवी रात-दिन भारतीय परंपरा को कोसते रहते हैं. अवैज्ञानिक कहते हैं. गीता, उपनिषद, योग उपहास्य हैं. ज्योतिष अंधविश्वास है. आयुर्वेद तिथिबाह्य है. फिर व्याकरण और काव्य सिद्धांत की तो बात ही क्यों करें? षट्दर्शन की चर्चा फिर कौन करे? दुनिया के उत्तर आधुनिक चिंतक नागार्जुनाचार्य से फ़िलॉस्फ़ी सीखते हैं और पाणिनी से व्याकरण सीखते हैं पश्चिम के भाषाचिंतक! और हम इनके दाय से भी अनभिज्ञ!  पाणिनी के पारिभाषिक शब्द जो सर्वज्ञात होने चाहिए थे, आज हमारे लिए कौतुक और आश्चर्य का विषय हैं. और कश्मीर को भी हम आज राजनीतिक और सांप्रदायिक कारणों से ही जानते हैं, आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त, कल्हण और क्षेमेन्द्र के देश के रूप में नहीं. यह हमारी शिक्षा परंपरा पर ही एक टिप्पणी है 
आत्‍मघृणा, आत्‍म-धिक्‍कार और आत्‍मग्‍लानि
औपनिवेशिक हीनता-बोध से उपजे रीढ़हीन आत्‍म-दैन्‍य को उन्‍होंने अपने चिंतन का व्‍याकरण बना लिया. हर हिंदू प्रतीक घृणित हो गया, चाहे वह कितना ही उदात्‍त क्‍यों ना हो. हर हिंदू रूपक लज्‍जास्‍पद हो गया, चाहे वह कितना ही निरापद क्‍यों ना हो. सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद को जातीय अस्मिता से जोड़ा जाने लगा. और इसमें दक्षिणपंथ और वामपंथ की एक भीषण दुरभिसंधि को भी आप लक्ष्‍य कर सकते हैं. दक्षिणपंथ कहता है : “उग्र राष्‍ट्रवाद ही हिंदुत्‍व है.” वामपंथ कहता है : “जी हां, और इसीलिए हिंदू अस्मिता एक त्‍याज्‍य मूल्‍य है.” यह एक श्रेष्‍ठ और सहिष्‍णु सांस्‍कृतिक परंपरा पर दोहरा प्रहार है : भीतर से और बाहर से!
बहुत याद आते हैं गोपीनाथ कविराज, भगवतशरण उपाध्‍याय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सच्चिदानंद वात्‍स्‍यायन, विद्यानिवास मिश्र, श्रीनरेश मेहता और निर्मल वर्मा : इन मनीषियों के होते “हिंदू-भर्त्‍सना” का ऐसा सामूहिक एकालाप संभव ना होने पाता, जैसा कि आज 
कोई भी जाति आठों पहर आत्‍मग्‍लानि में डूबी नहीं रह सकती. गौरव जातीय अस्मिता का ग्रास है. उससे वह पुष्‍ट होती है. सनातन परंपरा आत्‍ममंथन में स्‍वयं सक्षम है और सुधारों के लिए तत्‍पर भी रही है, फिर भी उसे हमेशा लज्जित करने के प्रयास क्‍यों किए जाने चाहिए?

इति नमस्कारन्ते

वंशावली श्री राम की 

1 – ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 – मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,

3 – कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,

4 – विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,

5 – वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |

6 – इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,

7 – कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,

8 – विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,

9 – बाण के पुत्र अनरण्य हुए,

10- अनरण्य से पृथु हुए,

11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,

12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,

13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,

14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,

15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,

16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,

17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,

18- भरत के पुत्र असित हुए,

19- असित के पुत्र सगर हुए,

20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,

21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,

22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,

23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |

24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |

25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,

26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,

27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,

28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,

29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,

30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,

31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,

32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,

33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,

34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,

35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,

36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,

37- अज के पुत्र दशरथ हुए,

38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ 

🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹

1:~मानस में राम शब्द = 1443 बार आया है।

2:~मानस में सीता शब्द = 147 बार आया है।

3:~मानस में जानकी शब्द = 69 बार आया है।

4:~मानस में बैदेही शब्द = 51 बार आया है।

5:~मानस में बड़भागी शब्द = 58 बार आया है।

6:~मानस में कोटि शब्द = 125 बार आया है।

7:~मानस में एक बार शब्द = 18 बार आया है।

8:~मानस में मन्दिर शब्द = 35 बार आया है।

9:~मानस में मरम शब्द = 40 बार आया है।
10:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।

11:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।

12:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है।

13:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।

14:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है।

15:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है।

16:~मानस में छन्द संख्या = 86 है।

17:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।

18:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।

19:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।

20:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।

21:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।

22:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।

23:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।
24:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।

25:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।
26:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।

27:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।

28:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।

🙏�  जय श्री राम   🙏

शेयरों में निवेश के 4 सुनहरे नियम

अगर आप शेयरों में निवेश करना चाहते हैं तो ये मुख्य चार बातें अवश्य याद रखें।

 

1. सही कंपनी चुनिये- मुनाफे में बढोत्तरी करने वाली तथा बेहतर कंपनी चुनें जिसने अपने शेयरधारकों की पूंजी पर कम से कम 20% लाभ अर्जित किया हो।
आदर्श रूप से एक दीर्घकालिक निवेश (5वर्ष से अधिक) आपको कंपनी के विकास में भाग लेने की अनुमति देता है।
कम अवधि( 3 से 6 महीने) में शेयर का प्रदर्शन कंपनी के मूल सिध्दांत से कम तथा बाजार भाव से अधिक प्रेरित होता है। जबकि लंबे काल में सही कीमत की प्रासंगिकता कम हो जाती है।

2.अनुशासित रहें- शेयर में निवेश एक लंबी सीखने की प्रक्रिया है,जिसमें आप अपनी गलतियों से सीखते हैं। ये कुछ तथ्य हैं जिनसे ये प्रक्रिया सरल हो सकती है।
निवेश में विविधता- किसी एक शेयर में अपने कोष का 10% से ज्यादा न डालें भले ही वो एक रत्न हो,दूसरी ओर बहुत अधिक शेयरों में भी निवेश न करें क्योंकि उनकी  निगरानी करना मुश्किल होता है। एक कम सक्रिय लंबी अवधि के निवेशक के लिये 15-20 विभिन्न शेयर अच्छी संख्य़ा है।
इस asset allocation tool का प्रयोग करें जिससे ये पता लगाया जा सके कि आपको शेयरों से अतिरिक्त निवेश करने की जरूरत है क्या।
.अपनी कंपनी के प्रदर्शन का विश्लेषण उसके तिमाही परिणाम, वार्षिक रिपोर्ट और समाचार लेखों से करते रहें।
.एक अच्छा ब्रोकर ढूंढे तथा निपटान प्रणाली समझें।
.हॉट टिप्स पर ध्यान न दें क्योंकि अगर ये सच में काम करती तो हम सब करोङपति होते।
.और अधिक खरीदने के प्रलोभन से बचें क्योंकि प्रत्येक खरीद एक नये निवेश का निर्णय है। एक कंपनी के उतने ही शेयर खरीदें जितने आपके कुल आवंटन योजना के अनुसार हैं।

3.निगरानी और समीक्षा—अपने निवेश की नियमित निगरानी व समीक्षा करें। लिये गये शेयर के तिमाही परिणामों की घोषणा पर नजर रखें और सप्ताह में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो वर्कशीट पर शेयर की कीमतों में आये सुधार लिखते रहें। ये कार्य अस्थिर समय के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण है जब आप मूल्य चुनने के लिये बेहतर अवसर पा सकते हैं।
जैसे कि पता लगायें कि आप 50 पैसे के सिक्के में 1 रूपये के सिक्के कैसे खरीद सकते हैं buy 1 rupee coins at 50 paise
इसके अलावा ये भी जांचे कि जिन कारणों से आपने पहले शेयर खरीदा था वे अभी भी वैध हैं य़ा आपके पहले के अनुमानों और उम्मीदों में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। साथ ही एक वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया अपनायें जिससे आप अपने कुल परिसंपत्ति आवंटन के भीतर इक्विटी शेयरों के प्रदर्शन की जांच कर सकें।
अगर जरूरी हो तो आप RiskAnalyser पर समीक्षा कर सकते हैं क्योंकि आपके जोखिम प्रोफाइल और जोखिम क्षमता में 12 महीने की अवधि में परिवर्तन हो सकता है।

4. गलतियों से सीखें- समीक्षा के दौरान अपनी गलतियों को पहचानें और उनसे सीखें,क्योंकि आपके खुद के अनुभव को कोई नही हरा सकता। यही अनुभव आपके ‘ ज्ञान के मोती ’ बनेंगे जो निश्चित ही आपको एक सफल शेयर निवेशक बनाने में सहायक होंगे।