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नमस्कार!

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सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

जैसे हम हैं वैसे ही रहें,
लिये हाथ एक दूसरे का
अतिशय सुख के सागर में बहें।
मुदें पलक, केवल देखें उर में,-
सुनें सब कथा परिमल-सुर में,
जो चाहें, कहें वे, कहें।

हिंदी कविता अपने जीवनकाल में अनेक पड़ावों से गुज़रा है। जिसमें अनेक विचार धाराओं का बहुत तेज़ी से विकास हुआ। इसमें छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग, नयी कविता युग और साठोत्तरी कविता इन नामों से जाना गया, मगर छायावाद से पहले के पद्य को भारतेंदु हरिश्चंद्र युग और महावीर प्रसाद द्विवेदी युग के दो और युगों में बांटा गया।

इनमें छायावादी युग की अगर बात की जाए तो इसके चार प्रमुख स्तंभ हैं। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा एवं सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’।

जन्म…
इनका जन्म बंगाल की महिषादल रियासत (जिला मेदिनीपुर) में माघ शुक्ल ११, संवत् १९५५, दिनाँक २१ फरवरी, १८९९ को हुआ था। उनके पिताश्री पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ाकोला नामक गाँव के निवासी थे।

शिक्षा…
निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। बाद में हिन्दी, संस्कृत और बाङ्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया। पिता की छोटी-सी नौकरी की असुविधाओं और मान-अपमान का परिचय निराला को आरम्भ में ही प्राप्त हुआ। तीन वर्ष की आयु में माता और बीस वर्ष की आयु तक में पिता का देहांत हो गया। अपने परिवार के साथ संयुक्त परिवार का भी बोझ निराला पर पड़ा। पहले महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। शेष कुनबे का बोझ उठाने में महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में कैसे बीता होगा यह या तो निराला जानते होंगे अथवा ईश्वर। लेकिन कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, साहस के साथ जूझते रहे।

आगे से अंत तक उनकी जिंदगी इलाहाबाद के दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में गुजरी।

कार्यक्षेत्र…
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की पहली नियुक्ति महिषादल राज्य में ही हुई। उसके बाद संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य की ओर प्रवृत्त हुए। कोलकाता से प्रकाशित ‘समन्वय’ का संपादन किया, तत्पश्चात १९२३ के अगस्त से मतवाला के संपादक मंडल में कार्य किया। इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई जहाँ वे संस्था की मासिक पत्रिका सुधा से संबद्ध रहे। कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी गुजारा। इसके बाद १९४२ से अंत समय तक वे इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य करते रहे।

उनकी पहली कविता जन्मभूमि प्रभा नामक मासिक पत्र में जून १९२० में, पहला कविता संग्रह १९२३ में अनामिका नाम से, तथा पहला निबंध बंग भाषा का उच्चारण अक्टूबर १९२० में मासिक पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुआ। अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है।

कृति…

काव्यसंग्रह…
अनामिका, परिमल, गीतिका, अनामिका (द्वितीय) (इसी संग्रह में सरोज स्मृति और राम की शक्तिपूजा जैसी प्रसिद्ध कविताओं का संकलन है।), तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत कुंज, सांध्य काकली, अपरा (संचयन)

उपन्यास…
अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा, चोटी की पकड़, काले कारनामे(अपूर्ण), चमेली(अपूर्ण), इन्दुलेखा(अपूर्ण)।

कहानी संग्रह…
लिली, सखी, सुकुल की बीवी, चतुरी चमार, देवी।

निबन्ध-आलोचना…
रवीन्द्र कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह।

पुराण कथा…
महाभारत, रामायण की अन्तर्कथाएँ।

बालोपयोगी साहित्य
भक्त ध्रुव, भक्त प्रहलाद, भीष्म,
महाराणा प्रताप, सीखभरी कहानियाँ (ईसप की नीतिकथाएँ)।

अनुवाद…
रामचरितमानस(विनय-भाग)-1948(खड़ीबोली हिन्दी में पद्यानुवाद), आनंद मठ(बाङ्ला से गद्यानुवाद), विष वृक्ष, कृष्णकांत का वसीयतनामा, कपालकुंडला, दुर्गेश नन्दिनी, राज सिंह, राजरानी, देवी चौधरानी, युगलांगुलीय, चन्द्रशेखर, रजनी, श्रीरामकृष्णवचनामृत(तीन खण्डों में), परिव्राजक, भारत में विवेकानंद, राजयोग(अंशानुवाद)।

रचनावली…
निराला रचनावली नाम से 8 खण्डों में पूर्व प्रकाशित एवं अप्रकाशित सम्पूर्ण रचनाओं का सुनियोजित प्रकाशन (प्रथम संस्करण-1983)

और अंत में…

तुमने जो दिया दान दान वह,
हिन्दी के हित का अभिमान वह,
जनता का जन-ताका ज्ञान वह,
सच्चा कल्याण वह अथच है–
यह सच है!

बार बार हार हार मैं गया,
खोजा जो हार क्षार में नया,
उड़ी धूल, तन सारा भर गया,
नहीं फूल, जीवन अविकच है–
यह सच है!

श्री माधव सदाशिव गोलवलकर

मधु जब मात्र दो वर्ष के थे तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी। पिताश्री भाऊजी जो भी उन्हें पढ़ाते थे उसे वे सहज ही इसे कंठस्थ कर लेते थे। बालक मधु में कुशाग्र बुध्दि, ज्ञान की लालसा, असामान्य स्मरण शक्ति जैसे गुणों का समुच्चय बचपन से ही विकसित हो रहा था। १९१९ में उन्होंने ‘हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा’ में विशेष योग्यता दिखाकर छात्रवृत्ति प्राप्त की। १९२२ में १६ वर्ष की आयु में मधु माधव हो गए। मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने चाँदा के ‘जुबली हाई स्कूल’ से उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् १९२४ में उन्होंने नागपुर के ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित ‘हिस्लाप कॉलेज’ से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। अंग्रेजी विषय में उन्हें प्रथम पारितोषिक मिला। वे भरपूर हाकी तो खेलते ही थे कभी-कभी टेनिस भी खेल लिया करते थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम का भी उन्हें शौक था। मलखम्ब के करतब, पकड़ एवं कूद आदि में वे काफी निपुण थे। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने बाँसुरी एवं सितार वादन में भी अच्छी प्रवीणता हासिल कर ली थी।

इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद माधव से माधवराव हो कर जीवन में एक नये दूरगामी परिणाम वाले अध्याय का प्रारम्भ करने के लिए १९२४ में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। १९२६ में उन्होंने बी.एससी. और १९२८ में एम.एससी. की परीक्षायें भी प्राणि-शास्त्र विषय में प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण कीं। इस तरह उनका विद्यार्थी जीवन अत्यन्त यशस्वी रहा। विश्वविद्यालय में बिताये चार वर्षों के कालखण्ड में उन्होंने विषय के अध्ययन के अलावा संस्कृत महाकाव्यों, पाश्चात्य दर्शन, श्रीरामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द की ओजपूर्ण एवं प्रेरक ‘विचार सम्पदा’, भिन्न-भिन्न उपासना-पंथों के प्रमुख ग्रंथों तथा शास्त्रीय विषयों के अनेक ग्रंथों का आस्थापूर्वक पठन किया। इसी बीच उनकी रुचि आध्यात्मिक जीवन की ओर जागृत हुई। एम.एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वे प्राणि-शास्त्र विषय में ‘मत्स्य जीवन’ पर शोध कार्य हेतु मद्रास (चेन्नई) के मत्स्यालय से जुड़ गये। एक वर्ष के दौरान ही उनके पिता श्री भाऊजी सेवानिवृत्त हो गये, जिसके कारण वह पैसा भेजने में असमर्थ हो गये। इसी समय मद्रास-प्रवास के दौरान वे गम्भीर रूप से बीमार पड़ गये। चिकित्सक का विचार था कि यदि सावधानी नहीं बरती तो रोग गम्भीर रूप धारण कर सकता है। दो माह के इलाज के बाद वे रोगमुक्त तो हुए परन्तु उनका स्वास्थ्य पूर्णरूपेण से पूर्ववत् नहीं रहा। मद्रास प्रवास के दौरान जब वे शोध में कार्यरत थे तो एक बार हैदराबाद का निजाम मत्स्यालय देखने आए। नियमानुसार प्रवेश-शुल्क दिये बिना उन्हें प्रवेश देने से माधवराव ने इन्कार कर दिया। आर्थिक तंगी के कारण उनको अपना शोध-कार्य अधूरा छोड़ कर अप्रैल १९२९ में नागपुर वापस लौटना पड़ा।

नागपुर आकर भी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा। इसके साथ ही उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी अत्यन्त खराब हो गयी थी। इसी बीच बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें सेवा करने का प्रस्ताव मिला। १६ अगस्त, १९३१ को उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में अपना पद संभाल लिया। चूँकि यह अस्थायी नियुक्ति थी। इस कारण वे प्राय: चिन्तित भी रहा करते थे।

अपने विद्यार्थी जीवन में भी माधव राव अपने मित्रों के अध्ययन में उनका मार्गदर्शन किया करते थे और अब तो अध्यापन उनकी आजीविका का साधन ही बन गया था। उनके अध्यापन का विषय यद्यपि प्राणि विज्ञान था, विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी प्रतिभा पहचान कर उन्हें बी.ए. की कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का अवसर दिया। अध्यापक के नाते माधव राव अपनी विलक्षण प्रतिभा और योग्यता से छात्रों में इतने अधिक अत्यन्त लोकप्रिय हो गये कि उनके छात्र उनको अब गुरुजी के नाम से सम्बोधित करने लगे, और फिर इसी नाम से वे आगे चलकर जीवन भर जाने जाने लगे।

संघ प्रवेश…

डॉ॰ हेडगेवार के द्वारा काशी विश्वविद्यालय भेजे गए नागपुर के स्वयंसेवक भैयाजी दाणी के द्वारा गुरूजी संघ के सम्पर्क में आये और उस शाखा के संघचालक भी बने। १९३७ में वो नागपुर वापस आ गए। नागपुर में श्री गुरूजी के जीवन में एक दम नए मोड़ का आरम्भ हो गया। डॉ साहब के सानिध्य में उन्होंने एक अत्यंत प्रेरणा दायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। किसी आप्त व्यक्ति के द्वारा इस विषय पर पूछने पर उन्होंने कहा- “मेरा रुझान राष्ट्र संगठन कार्य की और प्रारम्भ से है। यह कार्य संघ में रहकर अधिक परिणामकारिता से मैं कर सकूँगा ऐसा मेरा विश्वास है। इसलिए मैंने संघ कार्य में ही स्वयं को समर्पित कर दिया। मुझे लगता है स्वामी विवेकानंद के तत्वज्ञान और कार्यपद्धति से मेरा यह आचरण सर्वथा सुसंगत है।”

१९३८ के पश्चात संघ कार्य को ही उन्होंने अपना जीवन कार्य मान लिया। डॉ साहब के साथ निरंतर रहते हुवे अपना सारा ध्यान संघ कार्य पर ही केंद्रित किया। इससे डॉ साहब का ध्येय पूर्ण हुआ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ साहब के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव और प्रबल आत्म संयम होने की वजह से १९३९ में श्री माधव सदाशिव गोलवलकर जी यानी गुरुजी को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। १९४० में डॉ साहब का ज्वर बढ़ता ही गया और अपना अंत समय जानकर उन्होंने उपस्थित कार्यकर्ताओं के सामने गुरूजी को अपने पास बुलाया और कहा ‘अब आप ही संघ का कार्य सम्भालें’ और स्वयं अनंत में विलीन हो गए।

गुरूजी का जन्म १९ फरवरी, १९०६ को फाल्गुन मास की एकादशी संवत् १९६३ को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य ‘भाऊ जी’ तथा माता का नाम श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य ‘ताई’ था। कालांतर में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक तथा महान विचारक बने। गुरूजी ने बंच ऑफ थॉट्स तथा वी,ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइंड पुस्तकें लिखीं।

मनुवाद बनाम न्याय प्रक्रिया और आरोप…

#UBI प्रतियोगिता : ३३
विषय : न्याय
दिनाँक : २२/०१/२०२०

यदि, वेदों पर आधारित मूल मनुस्मृति का अवलोकन करने पर हम पाएंगे कि आज मनुवाद का विरोध बस अज्ञानता का परिचायक है और वह मनुस्मृति से बिल्कुल उलट और निरर्थक है। महर्षि मनु की दण्ड व्यवस्था अपराध के स्वरूप और उसके प्रभाव एवं अपराधी की शिक्षा, पद और समाज में उसके प्रभाव पर निर्भर करता है।

मनुस्मृति में ब्राह्मण का दर्जा सिर्फ ज्ञानी को है नाकि उसके उच्च कुल में जन्म के आधार पर।
माता के गर्भ से जन्म के उपरांत कोई मनुष्य अपना कुल उच्च करने का यहाँ अधिकारी है, वह
यहाँ विद्या, ज्ञान और संस्कार से पुनः जन्म प्राप्त कर द्विज बन सकता है और अपने सदाचार से ही समाज में प्रतिष्ठा पा सकता है।

मनुस्मृति के अनुसार सामर्थ्यवान व्यक्ति की जवाबदेही भी अधिक होती है, अत: यदि वे अपने उत्तरदायित्व को सही तरीके से नहीं निभाता है तो वह कठोर दण्ड का भागी है। जिस अपराध में सामान्य जन को एक पैसा दण्ड दिया जाए वहां शासक वर्ग को एक हजार गुना दण्ड देना चाहिए।

(अगर कोई अपनी स्वेच्छा से और अपने पूरे होशो हवास में चोरी करता है तो उसे एक सामान्य चोर से ८ गुना सजा का प्रावधान होना चाहिए यदि वह शूद्र है, अगर वैश्य है तो १६ गुना, क्षत्रिय है तो ३२ गुना, ब्राह्मण है तो ६४ गुना। यहां तक कि ब्राह्मण के लिए दण्ड १०० गुना या १२८ गुना तक भी हो सकता है। दूसरे शब्दों में दण्ड अपराध करने वाले की शिक्षा और सामाजिक स्तर के अनुपात में होना चाहिए।)

प्रचलित धारणा के विपरीत मनु शूद्रों के लिए शिक्षा के अभाव में सबसे कम दण्ड का विधान करते हैं। मनु ब्राह्मणों को कठोरतर और शासकीय अधिकारीयों को कठोरतम दण्ड का विधान करते हैं। सामान्य नागरिकों में से भी शिक्षित तथा प्रभावशाली वर्ग, यदि अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ता है तो कठोर दण्ड के लायक है। अत: मनुस्मृति के अनुसार अपराधी की पद के साथ ही उसका दण्ड भी बढ़ता जाना चाहिए।

मनुस्मृति के अनुसार जो ब्राह्मण वेदों के अलावा अन्यत्र परिश्रम करते हैं, वह शूद्र हैं। जब तक कि वह सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन न कर लें और पूरी तरह से अपने दुर्गुणों से मुक्त न हो जाएं जिस में कटु वचन बोलना भी शामिल है।

(क्योंकि साधारण लोगों की तुलना में ब्राह्मणों को ६४ से १२८ गुना ज्यादा दण्ड दिया जाना चाहिए।)

मनुस्मृति के अनुसार, एक शक्तिशाली और उचित दण्ड ही शासक है। दण्ड न्याय का प्रचारक है। दण्ड अनुशासनकर्ता है। दण्ड प्रशासक भी है। दण्ड ही चार वर्णों और जीवन के चार आश्रमों का रक्षक है। यदि भली- भांति विचार पूर्वक दण्ड का प्रयोग किया जाए तो वह समृद्धि और प्रसन्नता लाता है परंतु बिना सोचे समझे प्रयोग करने पर दण्ड उन्हीं का विनाश कर देता है जो इसका दुरूपयोग करते हैं।

*अश्विनी राय ‘अरूण’*

रामकथा के विविध आयाम 

आज भी सबसे बड़ी चिन्ताजनक बात यह है की रामायण कब लिखा गया ? यह रामचरित है या सिर्फ कोई काल्पनिक ग्रंथ, वगैरह वगैरह। और इसमें कुछ भारतीय विद्वान समय सीमा तय करने में इस तरह उलझ जाते हैं की वे अपने धर्मग्रंथों द्वारा दिए कालखंड को दरकिनार कर अपनी विद्वता का परचम फहराते फिर रहे हैं। यह तो वही बात हुई की बेटा बाप से उनके कुल की मर्यादा पूछे। विद्वान यह कहते हैं कि यह ६०० ईपू से पहले लिखा गया है और उसके पीछे युक्ति भी यह देते हैं कि महाभारत जो इसके पश्चात आया बौद्ध धर्म के बारे में मौन है यद्यपि उसमें जैन, शैव, पाशुपत आदि अन्य परम्पराओं का वर्णन है। अतः रामायण गौतम बुद्ध के पूर्वकाल का होना चाहिये। भाषा विद्वानों के अनुसार इसकी भाषा-शैली पाणिनि के समय से पहले की होनी चाहिये। मगर यह बात हुई विद्वानों की विद्वता की, हम यहाँ उनके तर्कों में बिना पड़े सीधे सीधे इतना ही कह सकते हैं राम हमारे राजा हैं, भगवान हैं जिन पर कोई बहस की नहीं जा सकती और इसका सीधा साधा प्रमाण यह है की विश्वभर के तकरीबन सभी भाषाओं एवं बोलियों में रामकथा मिल जाएगी और इसी प्रमाण के साथ हम यहाँ प्रस्तुत हैं।

भगवान श्री रामचन्द्र जी के जैसा व्यक्तित्व, मर्यादा, नैतिकता, विनम्रता, करुणा, क्षमा, धैर्य, त्याग एवं पराक्रम का सर्वोत्तम उदाहरण पूरे संसार अथवा यूँ कहें चारों युगों और तीनों लोकों में किसी और को नहीं माना जा सकता है। श्रीराम का जीवनचरित्र एवं पराक्रम महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में वर्णित है। रामायण भारतीय संस्कृति एवं स्मृति का वह अंग है जिसके माध्यम से रघुवंश के राजा राम की गाथा युगों युगों से गाई जाती रही हैं। वाल्मीकि जी द्वारा संस्कृत में रचित एक अनुपम महाकाव्य है, जीसमें २४,००० श्लोक हैं। इसे आदिकाव्य तथा इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है। रामायण में सात अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी उनके जीवन पर केन्द्रित भक्ति भाव से पूर्ण सुप्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस की रचना की है। वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस के अतिरिक्त कई अन्य लेखकों ने भी कई अन्य भारतीय भाषाओं में रामायण की रचनाएं की हैं, जो काफी प्रसिद्ध रही हैं।
भिन्न-भिन्न प्रकार से गिनने पर रामायण तीन सौ से लेकर एक हजार तक की संख्या में विविध रूपों में मिलती हैं। इनमें से संस्कृत में वाल्मीकि रचित रामायण या आर्ष रामायण सबसे प्राचीन एवं मूल मानी जाती है। जिस प्रकार महर्षि वाल्मीकि जी के रामायण से प्रेरित एवं श्रीराम की भक्ति से वशीभूत होकर गोस्वामी जी ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्य की रचना कर डाली और जो कि वाल्मीकि जी के द्वारा संस्कृत में लिखे गये रामायण का हिंदी संस्करण भी है। रामचरितमानस मानवीय आदर्शों का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसीलिये यह सनातन धर्म का प्रमुख ग्रंथ है। उसी प्रकार रामायण से ही प्रेरित होकर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने पंचवटी तथा साकेत नामक खंडकाव्यों की रचना की है। रामायण में जहाँ सीता के समक्ष लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला को शायद भूलवश अनदेखा कर दिया गया है और इस भूल को साकेत खंडकाव्य में मैथिलीशरण गुप्त जी ने सुधार किया है।
साहित्यिक अथवा ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो शोध एवं अन्वेषण के क्षेत्र में आज भी भगवान श्रीराम के चरित्र, त्रेतायुग का भूगोल, रहन सहन, सभ्यता, संस्कृति आदि जैसे बिषयों के बारे में आधिकारिक रूप से जानने का मूल स्रोत महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण ही है। और रही बात श्रीराम-कथा की तो यह केवल वाल्मीकीय रामायण तक सीमित नहीं है, यह कथा तुलसीकृत रामचरितमानस के साथ ही साथ महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत में भी ‘रामोपाख्यान’ के रूप में आरण्यकपर्व (वन पर्व) में यह कथा वर्णित हुई है। इसके अतिरिक्त यह कथा ‘द्रोण पर्व’ तथा ‘शांतिपर्व’ में रामकथा के सन्दर्भ उपलब्ध हैं।
बौद्ध परंपरा में भी यह कथा श्रीराम से संबंधित दशरथ जातक, अनामक जातक तथा दशरथ कथानक नामक तीन जातक कथाओं में उपलब्ध है। जैन साहित्य में भी राम कथा से संबंधी कई ग्रंथ लिखे गये हैं, विमलसूरि द्वारा रचित पउमचरियं, आचार्य रविषेण द्वारा रचित पद्मपुराण (संस्कृत), स्वयंभू कृत पउमचरिउ, रामचंद्र चरित्रपुराण तथा गुणभद्र कृत उत्तर पुराण। जैन मतानुसार भगवान श्रीराम को ‘पद्म’ कहा गया है।
श्रीराम कथानक से प्रेरित होकर श्री भागवतानंद गुरु ने संस्कृत महाकाव्य श्रीराघवेंद्रचरितम् की रचना की जो अद्भुत है एवं गुप्त प्रसंग कथाओं से परिपूर्ण है। इस ग्रंथ में २० से भी अधिक प्रकार के रामायणों की कथाओ का समावेश किया गया है। कविवर श्री राधेश्याम जी, जो कभी नेपाल के राजदरबार से सम्मानित हुए थे उनकी राधेश्याम रामायण, प्रेमभूषण की प्रेम रामायण, महर्षि कम्बन की कम्ब रामायण के अलावा और भी अनेक साहित्यकारों ने वाल्मीकि एवं तुलसी रामायण से प्रेरणा ले कर अनन्य कृतियों की रचना कर डाली है। उनमें से कुछ के नाम हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
प्रथमतः हम भारतीय भाषाओं में लिखी गई रामकथा पर चर्चा करेंगे, हिन्दी में ही कम से कम ११, मराठी में ५, बाङ्ला में २५, तमिल में १२, तेलुगु में १२ तथा उड़िया में ६ रामायण मिलती हैं। इनमें से गोस्वामी जी द्वारा रचित मानस ने पूरे उत्तर भारत में अपना विशेष स्थान बनाया है।
इसके अतिरिक्त संस्कृत, गुजराती, मलयालम, कन्नड, असमिया, उर्दू, अरबी, फारसी आदि भाषाओं में रामकथा लिखी गयी। महाकवि कालिदास, महाकवि भास, क्षेमेन्द्र, भवभूति, राजशेखर, कुमारदास, विश्वनाथ, सोमदेव, गुणादत्त, नारद, लोमेश, केशवदास, गुरु गोविंद सिंह, समर्थ रामदास, संत तुकडोजी महाराज आदि चार सौ से अधिक कवियों तथा संतों ने अलग-अलग भाषाओं में राम तथा रामायण के दूसरे पात्रों के बारे में काव्यों/कविताओं की रचना की है। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री ने ‘रामायण मीमांसा’ की रचना करके उसमें रामगाथा को एक वैज्ञानिक आयाम आधारित विवेचना प्रदान किया है। वर्तमान में प्रचलित बहुत से राम-कथानकों में आर्ष रामायण, अद्भुत रामायण, कृत्तिवास रामायण, बिलंका रामायण, मैथिल रामायण, सर्वार्थ रामायण, तत्वार्थ रामायण, प्रेम रामायण, संजीवनी रामायण, उत्तररामचरितम्, रघुवंशम्, प्रतिमानाटकम्, कम्ब रामायण, भुशुण्डि रामायण, अध्यात्म रामायण, राधेश्याम रामायण, श्रीराघवेंद्रचरितम्, मन्त्ररामायण, योगवाशिष्ठ रामायण, हनुमन्नाटकम्, आनंदरामायण, अभिषेकनाटकम्, जानकीहरणम् आदि मुख्य हैं। इनके अलावा विदेशों में भी तिब्बती रामायण, पूर्वी तुर्किस्तान की खोतानीरामायण, इंडोनेशिया की ककबिनरामायण, जावा का सेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग, पातानीरामकथा, इण्डोचायना की रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैररामायण, बर्मा (म्यांम्मार) की यूतोकी रामयागन, थाईलैंड की रामकियेन आदि मुख्य हैं।
विश्व साहित्य में इतने विशाल एवं विस्तृत रूप से विभिन्न देशों में विभिन्न कवियों/लेखकों द्वारा राम के अलावा किसी और चरित्र का इतनी श्रद्धापूर्वक वर्णन नहीं किया है। भारत मे भी स्वतान्त्रोत्तर काल मे संस्कृत में रामकथा पर आधारित अनेक महाकाव्य लिखे गए हैं उनमे रामकीर्ति, रामश्वमेधीयम, श्रीमद्भार्गवराघवीयम, जानकीजीवनम, सीताचरितं, रघुकुलकथावल्ली, उर्मिलीयम, सीतास्वयम्बरम, रामरसायणं, सीतारामीयम, साकेतसौरभं आदि प्रमुख हैं। डॉ भास्कराचार्य त्रिपाठी रचित साकेतसौरभ महाकाव्य रचना शैली और कथानक के कारण विशिष्ट है। नाग प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह महाकाव्य संस्कृत-हिन्दी दोनों मे समानांतर रूप में प्रस्तुत है। इतना हीं नहीं ग्रन्थों, खण्ड काव्य, महाकाव्य, गीतों, कविताओं के साथ ही साथ रामकथा पर कई नाटक भी लिखे गए हैं। जैसे,
भास की छः अंकों वाली अभिषेक नाटक, यह भी रामकथा पर आश्रित है। इसमें रामायण के किष्किंधाकाण्ड से युद्धकाण्ड की समाप्ति तक की कथा अर्थात् बालिवध से राम राज्याभिषेक तक की कथा वर्णित है। श्रीराम राज्याभिषेक के आधार पर ही इसका नामकरण किया गया है।
भास रचित प्रतिमा नाटक, यह नाटक सात अंकों का है, जिसमें भास ने राम वनगमन से लेकर रावणवध तथा राम राज्याभिषेक तक की घटनाओं को स्थान दिया है। महाराज दशरथ की मृत्यु के उपरान्त ननिहाल से लौट रहे भरत अयोध्या के पास मार्ग में स्थित देवकुल में पूर्वजों की प्रतिमायें देखते हैं, वहाँ दशरथ की प्रतिमा देखकर वे उनकी मृत्यु का अनुमान लगा लेते हैं। प्रतिमा दर्शन की घटना प्रधानता की वजह से इसका नाम प्रतिमा नाटक रखा गया है। इसके अलावा भास की हीं यज्ञफल नाटक, दिंन्नाग की कुन्दमाला। भवभूति की महावीरचरित, इस नाटक में रामविवाह से लेकर राज्याभिषेक तक की कथा निबद्ध की गई है। कवि ने कथा में कई काल्पनिक परिवर्तन किए हैं, जो रोचक हैं। यह वीररस प्रधान नाटक है।
भवभूति की उत्तररामचरित, यह नाटक सात अंकों में है। राम के उत्तरजीवन को, जो अभिषेक के बाद आरंभ होता है, को चित्रित करता है। इसमें सीता निर्वासन कथा मुख्य है। अंतर यह है कि रामायण में जहाँ इस कथा का पर्यवसान (सीता का अंतर्धान) शोकपूर्ण है, वहीं इस नाटक की समाप्ति राम सीता के सुखद मिलन से की गई है।
आज के परिवेश में जहाँ राम के जन्म पर विवाद चरमोत्कर्ष पर है एवं उनकी जन्मभूमि आज पूरे विश्व में हास्यास्पद अवस्था में पहुंच चुकी है, और जीसका मुख्य कारण है बाबरी मस्जिद विवाद। और आश्चर्य की बात यह की उसी बाबर की अगली पीढ़ी के शासक ने, जिसे प्रगतिशील इतिहासकारों की पलटन ने अकबर महान कहा है। उसी अकबर ने नवम्बर १५८८ मेंं सचित्र रामायण का फारसी भाषा मे अनुवाद पूर्ण करवाया था जो आज भी जयपुर महल के संग्रहालय मे सुरक्षित रखा हुआ है। इस रामायण मे ३६५ पृष्ठ एवं १७६ चित्र हैं। इसके मुख्य चित्रकार लाल, केशव और बसावन हैं। इसी प्रकार कतर के दोहा मे भी मुगल रामायण रखा हुआ है, तथाकथित अकबर महान की मां हमीदा बानु बेगम के लिए बनाई गई थी। वह रामायण १६ मई १५९४ को पूर्ण हुए थी। मुगलिया कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने भी सचित्र रामायण का अनुवाद मुख्य चित्रकार श्याम सुंदर से करवाया था जो वर्तमान समय मे ‘फ्रिर गेलेरी ओफ आर्ट’ वाशिंगटन अमेरिका मे है। डबलिन के चेस्टर बेट्टी लाइब्रेरी, मे भी ४१ चित्रों वाली एक लघु योगवासिष्ठ रामायण है जो अकबर और जहाँगीर की कही जाती हैं।
इसके अलावा विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति डायोनीशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता दिखती है।
अब हम प्रसिद्धतम रामायण और उनके रचयिताओं के नाम देखते हैं।
संस्कृत में – रामायण, योगवासिष्ठ, आनन्द रामायण, अगस्त्य रामायण एवं अद्भुत रामायण – वाल्मीकि जी कृत, अध्यात्म रामायण – वेद व्यास जी कृत, रघुवंश- कालिदास जी कृत।
हिन्दी में – रामचरितमानस – गोस्वामी तुलसीदास जी, राधेश्याम रामायण – राधेश्याम, पउमचरिउ या पद्मचरित (जैनरामायण) – अपभ्रंश विमलसूरि।
गुजराती में – राम बालचरित, रामविवाह, लवकुशाख्यान – भालण कृत, अंगदविष्टि, लवकुशाख्यान एवं रामायण – विष्णुदास कृत, सीतानां संदेशा, रणजंग एवं सीतावेल- वजियो कृत, ऋषिश्रंग आख्यान, रणयज्ञ एवं रामायण – प्रेमानंद कृत, सीतानी कांचली एवं सीताविवाह – कृष्णाबाई कृत, रावण मंदोदरी संवाद एवं अंगदविष्टि – शामलभट्ट कृत, रावण मंदोदरी संवाद – श्रीधर, रामप्रबंध – मीठा, रामायणपुराण – स्वयंभूदेव, रामायण – नाकर, रामायण – कहान, रामायण – उद्धव, रामविवाह – वैकुंठ, सीतानो सोहलो – तुलसी, परशुराम आख्यान – शिवदास, महीरावण आख्यान – राणासुत, सीतास्वयंवर- हरिराम, सीतानो संदेशो – मंडण, रावण मंदोदरी संवाद – प्रभाशंकर, रामचरित्र – देवविजयगणि, रामरास – चन्द्रगणि, अंजनासुंदरीप्रबंध – गुणशील, सीताराम रास – बालकवि, अंगदविष्टि – कनकसुंदर, रामसीताप्रबंध – समयसुंदर, रामयशोरसायन – केशराज, सीताविरह – हरिदास, सीताहरण – जयसागर, सीताहरण – कर्मण, गुजराती योगवासिष्ठ – रामभक्त, राम बालकिया,
सीतास्वयंवर – कालीदास, सीतामंगल – पुरीबाई, रामकथा – राजाराम, रामविवाह – वल्लभ, रामचरित्र – रणछोड, सीताना बारमास – रामैया, रामायण – गिरधर।
उड़िया में – जगमोहन रामायण या दाण्डि रामायण या ओड़िआ रामायण – बळराम दास कृत, बिशिरामायण – बिश्वनाथ खुण्टिआ, सुचित्र रामायण – हरिहर, कृष्ण रामायण – कृष्णचरण पट्टनायक, केशब रामायण – केशब पट्टनायक, रामचन्द्र बिहार – चिन्तामणी, रघुनाथ बिळास – धनंजय भंज, बैदेहीशबिळास – उपेन्द्र भंज, नृसिंह पुराण – पीताम्बर दास, रामरसामृत सिन्धु – काह्नु दास, रामरसामृत – राम दास, रामलीळा – पीताम्बर राजेन्द्र, बाळ रामायण – बळराम दास, बिलंका रामायण – भक्त कवि शारलादास।
तेलुगु में – भास्कर रामायण, रंगनाथ रामायण, रघुनाथ रामायणम्, भोल्ल रामायण।
कन्नड में – कुमुदेन्दु रामायण, तोरवे रामायण, रामचन्द्र चरित पुराण, बत्तलेश्वर रामायण।
कथा रामायण – असमिया, कृत्तिवास रामायण – बांग्ला, भावार्थ रामायण – मराठी, रामावतार या गोबिन्द रामायण – पंजाबी (गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा रचित), रामावतार चरित – कश्मीरी, रामचरितम् – मलयालम, रामावतारम् या कंबरामायण – तमिल, रामायण – मैथिली (चन्दा झा)।
भोजपुरी विकास न्यास, भोजपुरी साहित्य विकास मंच, विश्व भोजपुरी सम्मेलन, भोजपुरी साहित्य मंडल आदि भोजपुरी संस्थाओ से सम्मानित भोजपुरी के मूर्धन्य महाकवि श्री बद्री नारायण दुबे जी द्वारा रचित रामायण “रामरसायन” महाकाव्य रामकथा वाचकों को अभूतपूर्व स्वरूप प्रदान करती है।
इनके अलावा परंपरागत रामायण में, मन्त्र रामायण, गिरिधर रामायण, चम्पू रामायण, आर्ष रामायण या आर्प रामायण। बौद्ध परंपरा के अनुसार – अनामक जातक, दशरथ जातक एवं दशरथ कथानक। जैन मतानुसार पउमचरियं, पउमचरिउ, रामचंद्र चरित्रपुरण, उत्तर पुराण।
भारतीय भाषाओं से इतर देश के बाहर के कुछ रामायण श्रृंखलाओं में,
नेपाल में- भानुभक्तकृत रामायण, सुन्दरानन्द रामायण एवं आदर्श राघव, सिद्धिदास महाजु। जावा- सेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग एवं पातानीरामकथा।
इण्डोचायना- रामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैररामायण।
बर्मा (म्यांम्मार)- यूतोकी रामयागन, रामवथ्थु एवं महाराम।
रामकर – कंबोडिया, तिब्बती रामायण, खोतानीरामायण – पूर्वी तुर्किस्तान, ककबिनरामायण – इंडोनेशिया, थाईलैंड -रामकियेन आदि।
रामायण पर आधारित रामकथा नामक महाकाव्यात्मक उपन्यास की रचना समकालीन हिन्दी साहित्य के प्रख्यात लेखक श्री नरेन्द्र कोहली जी ने भी की है। मानस को भक्तिभाव से एवं वाल्मीकि रामायण को श्रद्धाभाव से हम अपने मन्दिरों में स्थान देते हैं, मगर कठोरतम नियम एवं भाषा की तल्ल्खी की वजह से इन्हें हर वक्त अध्ययन कर पाना कठिन हो जान पड़ता है। लेकीन कोहली जी की रामकथा को आप रोमांचकारी उपन्यास के रूप में कभी भी कहीं भी बिना किसी के रोकटोक के पढ़ सकते हैं। राम चरित्र पर आधारित यह एक ऐसा महाकाव्यात्मक मौलिक उपन्यास है, जिसमें अतीत की कथा को वर्तमान सन्दर्भों में नवीन दृष्टिकोण से और भी सजीव कर दिया गया है। कोहली जी ने राम चरित्र और उनके जीवन की घटनाओ के माध्यम से, मानव मन और उसके बाह्य जगत के सरोकारों को मार्मिक ढंग से मूर्तिमान किया है। इस उपन्यास में सात ठहराव हैं। पहले ठहराव में सत्य और न्याय पर आधारित ‘दीक्षा’ है। दूसरे पड़ाव में रूढ़ियों के विरोध करने के ‘अवसर’ हैं। तीसरे पड़ाव में कथा ‘संघर्ष की ओर’ बढ़ती है। चौथे पड़ाव पर ‘साक्षात्कार’ लेती है। पांचवे पड़ाव पर यह मित्रता की ‘पृष्टभूमि’ तैयार करती है। छठे पड़ाव से सीता की खोज का ‘अभियान’ शुरू हो जाता है। और फिर अंत में सातवें और अंतिम पड़ाव पर ‘युद्ध’ और युद्ध के विचार अथवा विचारों का युद्ध को न्याय अन्याय के युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नरेन्द कोहली जी ने इस कालजयी कथा को अपने सशक्त लेखनी के माध्य से रामायण को अथवा रामकथा को अभूतपूर्व रूप से और समृद्ध किया है।
और अंत में, उन सवालों के जवाब जो महान विद्वानों द्वारा रामायण की आयु पर उठाए हैं। रामायण मीमांसा के रचनाकार धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी, गोवर्धनपुरी शंकराचार्य पीठ, पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र, श्रीराघवेंद्रचरितम् के रचनाकार श्रीभागवतानंद गुरु आदि के अनुसार श्रीराम अवतार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसके अनुसार श्रीरामचंद्र जी का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है, और यह आप स्वंय युग एवं काल गड़ना कर देख सकते हैं। इसके सन्दर्भ में विचार पीयूष, भुशुण्डि रामायण, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, संजीवनी रामायण एवं अन्य पुराणों से प्रमाण दिया जाता है।

कृष्णा सोबती

कछा चुडामणी पुरस्कार, शिरोमणी पुरस्कार, हिन्दी अकादमी अवार्ड, शलाका पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी फेलोशिप एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार (भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ) प्राप्त साहित्यकारा कृष्णा सोबती जी का जन्म १८ फरवरी, १९२५ को गुजरात में हुआ था, मगर भारत विभाजन पश्चात गुजरात का वह हिस्सा पाकिस्तान में चला गया।

विभाजन के बाद वे दिल्ली आकर बस गयीं और तब से यहीं रहकर साहित्य-सेवा करती रहीं। उन्हें १९८० में ‘ज़िन्दगीनामा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। १९९६ में उन्हें साहित्य अकादमी का फेलो बनाया गया जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है। २०१७ में भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान “ज्ञानपीठ पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।

इनकी कहानियाँ ‘बादलों के घेरे’ नामक संग्रह में संकलित हैं। इन कहानियों के अतिरिक्त इन्होंने आख्यायिका (फिक्शन) की एक विशिष्ट शैली के रूप में विशेष प्रकार की लंबी कहानियों का सृजन किया है जो औपन्यासिक प्रभाव उत्पन्न करती हैं। ऐ लड़की, डार से बिछुड़ी, यारों के यार, तिन पहाड़ जैसी कथाकृतियाँ अपने इस विशिष्ट आकार प्रकार के कारण उपन्यास के रूप में प्रकाशित भी हैं।

श्रीरामकृष्ण परमहंस

“घर, द्वार, मंदिर और सब कुछ अदृश्य हो गया, जैसे कहीं कुछ भी नहीं था! और मैंने एक अनंत तीर विहीन आलोक का सागर देखा, यह चेतना का सागर था। जिस दिशा में भी मैंने दूर दूर तक जहाँ भी देखा बस उज्जवल लहरें दिखाई दे रही थी, जो एक के बाद एक, मेरी तरफ आ रही थी।”

इतना सुनना काफी था लोगों के लिए, अफवाह फ़ैल गयी…

आध्यात्मिक साधना के कारण गदाधर का मानसिक संतुलन खराब हो गया है। पता लगते ही गदाधर की माता और बड़े भाई रामेश्वर ने गदाधर का विवाह करवाने का निर्णय लिया। उनका यह मानना था कि शादी होने पर गदाधर का मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा, शादी के बाद आये ज़िम्मेदारियों के कारण उनका ध्यान आध्यात्मिक साधना से हट जाएगा।

बात १८५९ की है, ५ वर्ष की शारदामणि मुखोपाध्याय से २३ वर्ष के गंगाधर का विवाह संपन्न कराया गया। मगर विवाह के बाद शारदा जयरामबाटी यानी अपने गाँव में रहती थी। जब १८ वर्ष की हुईं तो, वे रामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर में रहने लगी।

जी हाँ ! रामकृष्ण के पास, कालांतर में गंगाधर को रामकृष्ण कहा जाने लगा। अतः हम भी आगे रामकृष्ण ही कहेंगे।

रामकृष्ण का जन्म बंगाल प्रांत स्थित कामारपुकुर ग्राम के पिता खुदीराम एवं माता चन्द्रादेवी के यहाँ १८ फरवरी, १८३६ को हुआ था। रामकृष्ण को बचपन में गदाधर कहा जाता था। इसके पीछे भी एक रहस्य है…

उनके भक्तों के अनुसार रामकृष्ण के माता पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओं और दृश्यों का कई बार अनुभव हुआ था। गया में उनके पिता खुदीराम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें उन्होंने देखा की भगवान गदाधर (विष्णु के अवतार) ने उन्हें कहा की वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। उनकी माता चंद्रमणि देवी को भी ऐसा एक अनुभव हुआ था, उन्होंने शिव मंदिर में अपने गर्भ में रोशनी प्रवेश करते हुए देखा था। अतः उन्हें गदाधर कहा जाने लगा।

कालान्तर में उनके बड़े भाई चल बसे। इस घटना से वे व्यथित हो गए। संसार की अनित्यता को देखकर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। दक्षिणेश्वर स्थित पंचवटी में वे ध्यानमग्न रहने लगे। ईश्वर दर्शन के लिए वे इतने व्याकुल रहने लगे की लोग उन्हे पागल समझने लगे।

यही वह समय था जब भैरवी ब्राह्मणी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। उन्होंने उन्हें तंत्र की शिक्षा दी। मधुरभाव में अवस्थान करते हुए उन्हें श्रीकृष्ण का दर्शन प्राप्त हुआ। तत्पश्चात उन्होंने तोतापुरी महाराज जी से अद्वैत वेदान्त की ज्ञान प्राप्त किया और जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त किया। सन्यास ग्रहण करने के पश्चात ही उनका नया नाम हुआ…

श्रीरामकृष्ण परमहंस

इसके बाद उन्होंने ईस्लाम और क्रिश्चियन धर्म की भी कठोर साधना की। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना कर भक्त का जीवन अपनाया। स्वामी रामकृष्ण जी मानवता के पुजारी थे। साधना के बाद उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। वे ईश्वर तक पहुँचने के अलग अलग माध्यम मात्र हैं।

वक्त जैसे जैसे गुजरता रहा, उनके कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से चारों दिशाओं में फैलने लगे और दक्षिणेश्वर का सुन्दर मंदिर उद्यान शीघ्र ही भक्तों एवं भ्रमणशील संन्यासियों का प्रिय स्थल हो गया। तत्कालीन विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं॰ नारायण शास्त्री, पं॰ पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करने आते रहे। वह शीघ्र ही तत्कालीन सुविख्यात विचारकों के घनिष्ठ संपर्क में आए जो बंगाल में विचारों का नेतृत्व कर रहे थे। इनमें केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग भी था जिनमे रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, महेंद्रनाथ गुप्त (मास्टर महाशय), दुर्गाचरण नाग जैसे नाम थे।

अरे! एक नाम तो लेना मैं भूल ही गया, जहाँ तक मेरा मानना है उनके बिना शायद श्रीरामकृष्ण जी की जीवनी पूर्ण हो ही नहीं सकती। जी हाँ ! सही समझे स्वामी विवेकानन्द जी, उनके परम शिष्य।

श्रीरामकृष्ण जी के अनुसार, “कामिनी-कंचन ईश्वर प्राप्ति के सबसे बड़े बाधक हैं।” वे तपस्या, सत्संग और स्वाध्याय आदि आध्यात्मिक साधनों पर विशेष बल देते थे। वे कहा करते थे, “यदि आत्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रखते हो, तो पहले अहम्भाव को दूर करो। क्योंकि जब तक अहंकार दूर न होगा, अज्ञान का परदा कदापि न हटेगा। तपस्या, सत्सङ्ग, स्वाध्याय आदि साधनों से अहङ्कार दूर कर आत्म-ज्ञान प्राप्त करो, ब्रह्म को पहचानो।”

नमो नमः !

दिल मिल गए

TOW
साप्ताहिक प्रतियोगिता : ०.५
विषय : दो दिलों की कहानी
दिनाँक : ११/०२/२०

दो दिल कब मिले; कैसे बतलाऊं,
धड़कते दिल की आहट कैसे सुनाऊँ।
बोलो! क्या बतलाऊँ; क्या सुनाऊँ,
कैसे मिलन के अपने गीत गाऊँ।

उस दिन मैं सोया था,
मिलने जब भाई आया था।
मेरी शादी वाली ही बात है,
साथ में फोटो लेकर आया था।

इसने देखा; उसने देखा,
उस फोटो को सबने देखा।
शायद मेरी ही ग़लती थी,
बस एक झलक; मैने देखा।

पहली बार जब उसको देखा,
पहली बार ही दिल धड़का था।
लगता था रो-रोकर मर जाऊँ,
हालात पर फिर, मैं हँसता था।

उसको मैं कैसे पाऊंगा,
दिल लगाना कभी नहीं आया।
मगर आज प्यार के सागर में,
अपने को गहरे तक डूबा पाया।

इक फूल को कंटक का साथ
क्या बगिया को ठीक लगेगा?
उसके दर पर बारात लाना
क्या उस परी को ठीक लगेगा?

बिन उसके अंतर्मन सूना,
कैसे उसको यह बतलाऊं?
क्षणभंगुर-सी है पीर हमारी,
कैसे उसतक हाल पहुँचाऊ?

दिल को हाँथ में लेकर मैं,
डर को भी साथ में लेकर मैं,
शादी करके ले आया उसको,
कब तक झूठों-सा मुस्काऊँ मैं।

इस प्रश्न को रोज़ लिए मैं,
आज भी दिल ही दिल में लड़ता हूँ।
अगर और कुरेदोगे तुम इसको,
आज भी मैं उसपर जीता मरता हूँ।

अश्विनी राय ‘अरूण’

दिल मिल गए

पुस्तक समीक्षा : चरित्र और कलम

आदरणीय मंच, अध्यक्ष जी एवं प्रबुद्धजन को अश्विनी राय ‘अरूण’ का प्रणाम!

हिंदी साहित्य में लघुकथा नवीनतम् विधा है। हिंदी के अन्य सभी विधाओं की तुलना में लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के ज्यादा करीब है और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही है। इसे स्थापित करने में जितना हाथ भारतेन्दु जी, चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी, जयशंकर प्रसाद जी, मुंशी प्रेमचंद जी, माखनलाल चतुर्वेदी जी, सुदर्शन, यशपाल, रामवृक्ष बेनीपुरी जी का है। उतना ही योगदान लघुकथा को आगे ले जाने में उनके बाद की पीढ़ीयों का भी है। जिनमे हम अब डॉ ओम प्रकाश केसरी ‘पवननन्दन’ जी का नाम शान से ले सकते हैं।

लघुकथा शब्द का निर्माण लघु और कथा से मिलकर हुआ है। अर्थात लघुकथा गद्य की एक ऐसी विधा है जो आकार में लघु है और उसमे कथा तत्व विद्यमान है। अर्थात लघुता ही इसकी मुख्य पहचान है। जिस प्रकार उपन्यास खुली आंखों से देखी गयी घटनाओं का, परिस्थितियों का संग्रह होता है, उसी प्रकार कहानी दूरबीनी दृष्टि से देखी गयी किसी घटना या घटनाओं का वर्णन करती है।

मगर इसके ठिक विपरीत लघुकथा के लिए माइक्रोस्कोपिक दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है। इस क्रम में किसी घटना या किसी परिस्थिति का एक विशेष और महीनता से विलक्षण पल को शिल्प तथा कथ्य के लेंसों से कई गुना बड़ा कर एक उभार दिया जाता है। किसी बहुत बड़े घटनाक्रम में से किसी विशेष क्षण को चुनकर उसे हाइलाइट करने का नाम ही लघुकथा है। जैसे ; पवननन्दन जी की यह पुस्तक ‘चरित्र और कलम’ की कहानी “पारस”, “समझ”, “पैसे की मार”, “फालतू”, इसी क्रम में आती हैं।
हाँ “छड़ी” भी इस क्रम में आती है मगर…

आदरणीय श्री पवननन्दन जी जहाँ तक हमारा मानना है… लघुकथा का मतलब कतई छोटी कहानी से नहीं है, लघु कथा में लघु और कथा के बीच में एक खाली स्थान होता है…और यह स्थान सिर्फ पाठको के लिए है। जैसे… छड़ी की अंतिम पंक्ति “क्योंकि मैं खुद दादाजी का(की)
छड़ी बन जाऊंगा….।” मेरी समझ से कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए। क्यूंकि इसके बाद का खाली स्थान पाठकों के लिए है। उसी तरह…

“मरता क्या न करता” में भी….अंतिम पंक्ति से पहले ही कहानी पाठको के मध्य एक सवाल छोड़ कर निकल जाती।

“कैटेरिया” को हम व्यंग की श्रेणी में रख सकते हैं।
“अंतर” को हम आज के परिवेश के संस्कार की गाल पर तमाचा कह सकते हैं।
“फोटो” ने आज के सेल्फी समाज को एक नई दिशा प्रदान करने की कोशिश की है।

एक सी परिस्थिति के दो अलग बिन्दुओ को छूती दो अलग कहानियां ‘आड़े वक़्त’ एवं ‘अंगूठा दिखा दिया’

वैसे तो अध्यक्ष जी आप सभी हमसे बड़े हैं, विद्वान हैं एवं गुरू समान हैं…मगर मैं अपनी कुछ बातें आपकी आज्ञा से रखना चाहूंगा।

हम लघुकथा को कुछ आसानी से समझने के लिए शादी के एल्बम का उदाहरण लेते हैं।

शादी के एल्बम में उपन्यास की तरह ही कई अध्याय होते हैं, तिलक, मेहंदी, हल्दी, शगुन, बरात, फेरे-विदाई, रिसेप्शन आदि आदि।

ये सभी अध्याय स्वयं में अलग-अलग कहानियों की तरह स्वतंत्र इकाइयां होते हैं। लेकिन इसी एल्बम के किसी अध्याय में कई लघुकथाएं विद्यमान हो सकती हैं। कई क्षण ऐसे हो सकते हैं जो लघुकथा की मूल भावना के अनुसार होते हैं। जैसे ; “तो बाकी क्या रह गया” जो इसी पुस्तक की एक लघुकथा है।

यही वे क्षण हैं जो लघुकथा हैं। स्थूल में सूक्ष्म ढूंढ लेने की कला ही लघुकथा है। भीड़ के शोर-शराबे में भी किसी नन्हें बच्चे की खनखनाती हुई हंसी को साफ साफ सुन लेना लघुकथा है। भूसे के ढेर में से सुई ढूंढ लेने की कला का नाम लघुकथा है।

लघुकथा विसंगतियों की कोख से उत्पन्न होती है। हर घटना या हर समाचार लघुकथा का रूप धारण नहीं कर सकता। किसी विशेष परिस्थिति या घटना को जब लेखक अपनी रचनाशीलता और कल्पना का पुट देकर कलमबंद करता है तब एक लघुकथा का खाका तैयार होता है। जैसे; “पैसा बोल दिया”, “मन्दिर”, “वक्त की नजाकत ” आदि।

लघुकथा एक बेहद नाजुक सी विधा है। एक भी अतिरिक्त वाक्य या शब्द इसकी सुंदरता पर कुठाराघात कर सकता है। उसी तरह ही किसी एक किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द की कमी इसे विकलांग भी बना सकती है। अत: लघुकथा में केवल वही कहा जाता है, जितने की आवश्यक होती है।

दरअसल लघुकथा किसी बहुत बड़े परिदृश्य में से एक विशेष क्षण को चुरा लेने का नाम है। लघुकथा को अक्सर एक आसान विधा मान लेने की गलती कर ली जाती है, जबकि वास्तविकता बिलकुल इसके विपरीत है। लघुकथा लिखना गद्य साहित्य की किसी भी विधा में लिखने से थोड़ा मुश्किल ही होता है, क्योंकि रचनाकार के पास बहुत ज्यादा शब्द खर्च करने की स्वतंत्रता बिलकुल नहीं होती। शब्द कम होते हैं, लेकिन बात भी पूरी कहनी होती है। और सन्देश भी शीशे की तरह साफ देना होता है। इसलिए एक लघुकथाकार को बेहद सावधान और सजग रहना पड़ता है। यहाँ पवननन्दन जी निश्चय ही बधाई के पात्र हैं।

अध्यक्ष जी !
दुर्भाग्य से आजकल लघुकथा के नाम पर समाचार, बतकही, किस्सागोई यहां तक कि चुटकुले भी परोसे जा रहे हैं। यहाँ भी पवननन्दन जी साफ और स्वच्छ लेखनी के लिए बधाई के पात्र हैं।

अब कुछ बातें पुस्तक के संदर्भ में…. पुस्तक सही मायने में सच बोलती नजर आती है, मगर परिस्थिति से बंधी होने की वजह से उसकी सच्चाई कहीं कहीं खलती है।

जैसे –

1- पत्रिकाओं की भांति पुस्तक में प्रचार का होना।

2- “अपनों से अपनी बात” के अंत में लेखक का नाम का ना होना।

3- अनुक्रमणिका में कथाओं के क्रमांक का स्पष्ट ना होना।

4- दीपक पाण्डेय जी की ‘शुभकामना एवं साधुवाद’ एवं महेश जी द्वारा लिखित ‘साहीत्योलोचन’ में सिर्फ ‘गुलदस्ता’ का उल्लेख है। यहां नई पुस्तक का उल्लेख ना होना थोड़ा खल जाता है।

इस पुस्तक की भूमिका परम आदरणीय प्रबुद्ध साहित्यकार एवं वरिष्ठ अधिवक्ता और मेरे पूजनीय श्री रामेश्वर प्रसाद वर्मा जी ने लिखा है। जिनकी स्पष्टवादी विचार, वाणी एवं लेखनी का मैं सदैव से कायल रहा हूँ। और इनके जैसा बनने की इच्छा सदैव मेरे मन में प्रज्वलित रहती है। अतः भूमिका पर कुछ भी कहने का मतलब सूरज को दिया दिखाने के समान होगा।

भड़ास निकालती डॉ पवननंदन की लघुकथाए के माध्यम से आदरणीय श्री अतुल मोहन प्रसाद जी ने पूरी बात ही कह दि है। इस पर भी कुछ कहना “पीढ़ा चढ़ ऊंच” वाली कहावत को चरित्रार्थ करना होगा।

और अंत में;
डॉ ओम प्रकाश केसरी ‘पवननंदन’ जी को उनकी खुबसूरत पुस्तक “चरित्र और कलम” के लिए, मैं बधाई देता हूँ, और आशा करता हूँ की ऐसी ही सुन्दर और समाज को जवाब देती लघुकथा संग्रह से हमारी जल्द मुलाकात होगी।

धन्यवाद !

सन्त रविदास जयंती पर पुस्तक लोकार्पण सह समीक्षा संगोष्ठी का हुआ आयोजन

ख़ुदगर्जी

TOW
साप्ताहिक प्रतियोगिता : ०३
विषय : ख़ुदगर्ज़
दिनाँक : २२/०१/२०२०

धर्मग्रंथों के कथन मानों
उसके उसूलों को पहचानो
जिन पर चलकर ही तुम
खुदगर्ज़ी से बचोगे ये मानों

मगर खुदगर्ज़ी की भावना
स्वयं में भी एक उसूल है
ऊँचे आदर्शों को ठुकरा कर
लोग उसपर आज चल पड़े हैं

ख़ुदगर्जी जब भी आती है
अपने साथ महत्त्वाकांक्षा,
लालच, सत्ता और गौरव की
लालसा को साथ लाती है

ख़ुदगर्जी जब जब बढ़ने लगी है
गरीबी, नाइंसाफी, बेरोजगारी
महामारी बनकर बढ़ने लगी है
तब तब इंसानियत तड़पने लगी है

जब जब मनुष्य ख़ुदग़र्ज़ बना है
लोभी, अभिमानी, निन्दक, उग्र
नाशुक्र, बेवफ़ा, स्नेह रहित
दग़ाबाज़, ढीठ, घमण्डी बना है

आज लोगों का लालच,
खुदगर्ज़ी और बेईमानी
समस्या बनकर खड़ी है
इंसानियत के आगे अड़ी है

ईश्वर, माँ-बाप को भुलाकर
आराम तलबी बन जाएगा
भक्त का वेश धारण किए
पाप कर्म वो करने लग जाएगा

ख़ुदगर्जी से गर बचना हो
स्वयं को पहले नम्र बनालो
खुदगर्ज़ जमाने से लड़ना हो
तो स्वयं से ही पहले लड़ पड़ो

अनुशासन ही ख़ुदगर्जी से
इंसान को बचाता है
सच्चा प्यार ही उसे
भगवान से मिलाता है

अश्विनी राय ‘अरूण’